हलचल…बैज, महंत या फिर भूपेश

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जनता से इतनी बेरुखी क्यों?

कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है। जाहिर सी बात है जनता ही यहां अपना प्रतिनिधि चुनती है, जो गांव से लेकर राजधानी तक जन भावनाओं को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के वर्तमान हालात देखकर ऐसा लगता है कि यहां जनप्रतिनिधियों ने जनभावनाओं और जनता को सुनना-देखना बंद कर दिया है। यहां जनप्रतिनिधि संभवत: जनता के बीच नहीं जाते, उन्हें अपने क्षेत्र की जनता से मिलने और सुनने में भी दिलचस्पी नहीं दिख रही। यहां तक कि ज्यादातर जनप्रतिनिधियों के सरकारी आवास के दरवाजे भी आम जनता के लिए यहां बंद कर दिए गए हैं। बिना अपाईमेंट के यहां जनता अपने नेता से नहीं मिल सकती। शायद जनप्रतिनिधि जनता की आवाज सुनते तो यहां बलौदाबाजार कांड नहीं होता, यहां सूरजपुर में जनता डिप्टी कलेक्टर को सरेराह नहीं दौड़ाती, उन्हें अपनी जान बचाकर भागना नहीं पड़ता। इस कड़ाके की ठंठ में दस दिन तक तमनार की जनता सड़क पर नहीं बैठती। यहां सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों को जनता से मिलने की फुर्सत नहीं है? आखिर जनता ने आपको निर्वाचित क्यों किया है? आपका दायित्व क्या है? उनकी पीड़ा कौन सुनेगा? जनता की पीड़ा सुनने की वजाय हर जगह पुलिस की तैनाती कितनी वाजिव है? इस पर मंथन और चिंतन की जरुरत है। आखिर तमनार की घटना का असली जिम्मेदार कौन है? उस बेबस महिला कर्मचारी के चीरहरण का वास्तविक गुनाहगार कौन है? निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को जनता से मिलने से परहेज क्यों हैं? जनता से नेताओं की इतनी बेरुखी क्यों है? तमनार की घटना में बीते घटनाओं से सबक क्यों नहीं लिया गया? क्या अब यहां भी नेताओं की गलतियों पर पर्दा डाला जाएगा? क्या तमनार मामले में निर्णय लेने में असहाय दिखे एसपी-कलेक्टर को हटाकर घटना में पर्दा डाल दिया जाएगा? फिलहाल इसका खुलासा निकट भविष्य में होने जा रहा है।

खास बनिये, आम बनोगे तो चूस लिये जाओगे

आज के दौर में सरकारें बेशर्म हो गई हैं, हालांकि लाभ लेने वालों को शर्म से बहुत कुछ लेना-देना नहीं होता। खैर अब सरकारों का ध्येय जनता की सेवा में कम विशेष लोगों को उपकृत करने पर ज्यादा दिखता है। इसीलिए कहा जाता है खास बनिए, आम बनोगे तो चूस लिए जाओगे। खास बनोगे तो एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि बार-बार उपकृत किए जाओगे। इसलिए आज से ही खास बनने में जुट जाइये। आप जिस प्रोफेशन में हैं, वहीं से शुरु कर दीजिए, सरकारें आपको जरुर उपकृत करेंगी। दरअसल यहां की सरकारों ने एक अफसर को इतना उपकृत किया कि पहले रिटायर होते ही उन्हें न्यायधीश के समकक्ष पद पर बिठा दिया गया। फिर उन्हें एक महत्वपूर्ण संस्था के चेयरमैन बना दिया गया। यह दोनों ही पद अपने आप में बेहद अहम माने जाते हैं। लेकिन गाड़ी यहीं नहीं रुकी सरकार ने साहब को बिना किसी झिझक के तीसरी बार भी उपकृत कर दिया। अब इन खास अफसर को एक आयोग में सचिव पद का दायित्व सौंप दिया गया है। हालांकि यह पद क्लास टू का माना जाता है। लेकिन यहां उपकृत होने वाले को किसी क्लास की चिंता नहीं है, न ही पद देने वालों को कोई शर्म है। इसलिए खास बनिए आम में कुछ नहीं रखा है।

बैज, महंत या फिर भूपेश

कांग्रेस संगठन में एक बार फिर बदलाव की सुगबुगाहट दिखने लगी है। दरअसल राज्य कांग्रेस में जिलाध्यक्षों के बाद प्रदेश महामंत्री और संयुक्त महामंत्री की नई नियुक्तियों होनी हैं। इसके साथ ही प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व दीपक बैज संम्भालेंगे या फिर भूपेश बघेल को कमान सौंप दी जाएगी, इस पर भी फैसला निकट भविष्य में होने जा रहा है।। हालांकि अभी राज्य में विधानसभा चुनाव को लेकर पूरा -पूरा तीन साल बाकी हैं, ऐसे में दीपक बैज का परफारमेंस काफी हद तक संतोषजनक माना जा रहा है। लेकिन राज्य के हालात को देखते हुए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व एक बार फिर छत्तीसगढ़ में अगे्रसिव लीडरशिप को आगे बढ़ाना चाहती है, जिस खांचे पर फिलहाल बैज फिट नहीं हैं। इस खांचे पर पूर्व सीएम भूपेश बघेल ही फिट दिख रहे हैं। भूपेश बघेल ही राज्य कांग्रेस के एकमात्र नेता हैं तो चारों तरफ घिरने के बावजूद भी लगातार अग्रेसिव राजनीति करते नजर आ रहे हैं। स्वाभाविक है भूपेश बघेल की राजनीति का तरीका एक बार फिर आलाकमान को पसंद आने लगा है। हांलांकि 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश कांग्रेस की कमान पूर्व सीएम भूपेश बघेल ही संभाल रहे थे। ऐसे में आलाकमान दीपक बैज पर फिर मुहर लगाती है, या राज्य में खोई हुई सत्ता पाने के लिए भूपेश बघेल को फिर आगे बढ़ाया जाएगा फिलहाल इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। संभव यह भी है कि डॉ. चरणदास महंत को प्रदेश कांग्रेस का मुखिया बना दिया जाए और भूपेश को नेताप्रतिपक्ष का दायित्व सौंप दिया जाए। हलांकि नए चेहरे के रुप में खरसिया विधायक उमेश पटेल का नाम भी उभरकर सामने आया है। बहरहाल कांग्रेस के संगठन में परिवर्तन होना तय है, किसे क्या जिम्मेदारी दी जाती है, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।

राज्यसभा की दौड़ शुरु

छत्तीसगढ़ में राज्य सभा के रिक्त हो रहे दो पदों को लेकर रणनीति बनना शुरु हो गई है। संख्याबल के हिसाब से दोनों दलों को एक-एक पद मिलना लगभग तय है। जिसको लेकर जोड़-तोड़ शुरु कर दी गई है। भाजपा की ओर से फिर एक बार नया चेहरा राज्यसभा में नजर आयेगा, तो वहीं कांग्रेस एक बार फिर बाहरी उम्मीदवार को मौका दे सकती है। हालांकि सुनाई तो यह भी दे रहा है कि फूलोदेवी नेताम को एक बार फिर कांग्रेस मौका दे सकती है। वहीं भाजपा की ओर से प्रमुख दावेदारों में प्रेमप्रकाश पांडे, कृष्णकुमार राय, महेश गागड़ा, महाराजा कमल भंजदेव, राजा रणविजय सिंह जूदेव के नाम शामिल हैं।

तेन्दुपत्ता घोटाला में खानापूर्ति

छत्तीसगढ़ राज्य को घोटालों का गढ़ बना दिया गया है। यहां बीते साल में इतने घोटाले हुए हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य को वल्र्ड रिकार्ड में शामिल किया जा सकता है। खैर दबे स्वर में चर्चित तेंदूपत्ता घोटाले में बड़े मछलियों को बचाने का आरोप लगने लगा है। दरअसल तेन्दूपत्ता घोटाले में बस्तर के सीधे-साधे आदिवासियों के हक की राशि को डकार लिया गया था। जिस पर मुख्यालय के कई प्रमुख अफसरों पर गंभीर आरोप लगे थे। हालांकि राज्य की जांच एजेन्सी ईओडब्ल्यू ने 7 करोड़ रुपये के तेंदूपत्ता घोटाले में सुकमा के डीएफओ रहे अशोक पटेल, सुकमा वनमंडल के तीन डिप्टी रेंजर देवनाथ भारद्वाज, चैतुराम बघेल, पोडियामी हिडमा वहीं वनरक्षक मनीष कुमार बारसे, प्रबंधक पायम सत्यनारायण, सुनील नुप्पो, रवि कुमार गुप्ता, मनोज कवासी, सीएच रमना और आयतू कोरसा को आरोपी बनाया है। कहा तो यह भी जा रहा है कि घोटाले के अन्य संदेहियों को भी जांच के दायरे में लिया गया है। अब देखना यह है कि 7 करोड़ के तेंदुपत्ता घाटाले में जांच एजेसिंयों के हाथ बड़े मछलियों तक भी पहुंचेगा या फिर डीएफओ और निचले स्तर पर कार्रवाई करके खानापूूर्ति कर दी जाएगी।

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