हलचल… राष्ट्रीय फलक पर चमकता छत्तीसगढ़

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राष्ट्रीय फलक पर चमकता छत्तीसगढ़

बीते दो साल में राष्ट्रीय फलक पर छत्तीसगढ़ राज्य ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। कभी नक्सलवाद के नाम से पहचाना जाने वाला छत्तीसगढ़ आज एक उभरता हुआ राज्य बनकर सामने आया है। केंद्र की भाजपा सरकार और राज्य कि विष्णु सरकार ने नक्सलवाद के नासूर का लगभग खात्मा कर दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य का बीता दो साल कई मायनों में अहम रहा है। दरअसल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस राज्य के प्रति विशेष रुचि दिखाई। प्रधानमंत्री का दो साल में कई दौरा हो चुका है। वहीं यह पहली दफा है जब पूरे देश के डीजीपी-आईजीपी सहित अजीत डोभाल जैसी शख्सियत हमारे राज्य में दो दिन गुजार रहे हैं। यहाँ सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं पर गहन मंथन किया जा रहा है। निश्चित ही राज्य के लिए यह गौरव का विषय है।

और कितने ननकीराम कंवर

राज्य में सिर्फ एक ननकीराम कंवर नहीं हैं, इस पर पार्टी और सरकार को मंथन करना चाहिए। दरअसल ननकीराम कंवर इन दिनों सरकार से काफी खफा चल रहे हैं, जिसकी वजह है कोरबा कलेक्टर अजीत कुमार बसंत। कलेक्टर के कार्यों से दुखी भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता ननकीराम कंवर ने उन्हें हटाने की मांग की थी, जिसको लेकर वह राजधानी रायपुर में भी धरना देने पहुंचे थे। खैर कलेक्टर के खिलाफ जांच का आदेश देकर सरकार ने प्रथम दृष्टया ननकीराम कंवर की मांग को खारिज कर दिया है। लेकिन क्या वास्तव में यह निर्णय सरकार और पार्टी के हित में है? इस पर भी मंथन और चिंतन करना चाहिए। क्या ननकीराम कंवर कलेक्टर बसंत पर कोई अनैतिक कार्य या भ्रष्टाचार करने का दबाव बना रहे थे? या फिर ननकीराम कंवर ने कलेक्टर कोरबा के खिलाफ जो आरोप लगाए हैं वह सच हैं? अब जांच रिपोर्ट में तथ्य जो भी सामने आये नुकसान सरकार और भाजपा का ही होना है। लेकिन हाल ही में रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल अपने कोरबा प्रवास के दौरान ननकीराम कंवर से मिलने पहुंचे, जो कहीं न कहीं खुला राजनीतिक संदेश है कि ननकीराम कंवर अकेले नहीं हैं, उनके साथ ऐसे नाराज और नाखुश नेताओं की लंबी फौज खड़ी है। खैर सरकार का काम नेताओं को खुश करना नहीं है, लेकिन पार्टी को इस पर मंथन करने की जरुरत है कि क्या राज्य में ननकीराम कंवर जैसे नेताओं की संख्या में वृद्धि करना उचित है।

सामूहिक नेतृत्व पर जोर

कांग्रेस ने हाल ही में जिलाध्यक्षों की सूची जारी की है। इस सूची में पूर्व सीएम भूपेश बघेल के समर्थकों का दबदबा है। वहीं बिलासपुर क्षेत्र में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत की पसंद का ख्याल रखा गया है। सरगुजा में टीएस सिंहदेव का प्रभाव कम नहीं हुआ है। कुल मिलाकर कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की सूची देखकर यह आकलन किया जा सकता है कि आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस किसी खेमेबाजी से दूर 2018 की तरह सामूहिक नेतृत्व में लडऩे पर जोर दे रही है। दरअसल 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव और डॉ. महंत की जोड़ी उभरकर सामने आई थी। वहीं इस तस्वीर में पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू भी जगह बनाने में कामयाब हो गए थे। लेकिन कांग्रेस की इस सूची को देखकर यह कहा जा सकता है कि ताम्रध्वज साहू को फिक्चर से हटा दिया गया है। उनके स्थान पर दुर्ग से युवा विधायक देवेन्द्र यादव अपनी जगह बनाते दिख रहे हैं। संकेत साफ है कि अगला विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस किसी चेहरे पर नहीं बल्कि सामूहिक नेतृत्व पर लडऩे की तैयारी कर रही है।

प्रापर्टी गाइडलाइन दर बढ़ाने के मायने और विरोध

वित्त मंत्री ने प्रापर्टी का गाइडलाइन दर बढ़ा दिया है। जिसको लेकर राज्य के चारों ओर जमकर विरोध हो रहा है। हालांकि यह दर ज्यादातार मेन रोड से लगी हुई जमीनों का बढ़ाया गया है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इससे किसानों को बड़ा फायदा होगा। अब यह बात अलग है कि रायपुर के तकरीबन 50 किलोमीटर की दूरी में मेन रोड़ पर किसानों की भूमि है या नहीं, इस पर मंथन किया जाना चाहिए। और मेन रोड़ की ही जमीनों के दर क्यों बढ़ाये गए इस पर भी चिंतन किया जाना चाहिए। वैसे तो सरकार के पास आकड़े उपलब्ध है जिसे देखकर यह आकलन किया जा सकता है कि मेन रोड़ पर कितने किसानों की जमीन बची है? खैर लाभ हानि किसे होगा फिलहाल इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन बढ़ी हुई बिजली बिल के बाद यह दूसरा मामला है जिसको लेकर राज्य के चारों ओर विरोध का स्वर सामने आ रहा है।

मंत्री जी का रियल एस्टेट प्रेम

राज्य में एक मंत्री और चार करोड़ का बंगला मामला काफी दिन सुर्खियों में रहा, हालांकि अब इसको लेकर पाठकों और जनता की रुचि कम हो गई है। इसके पीछे की वजह है कि एक मंत्री जी सीधा बंगला और जमीन छोड़ रियल एस्टेट के कारोबार मेें कूद गए हैं। मंत्री जी के रियल एस्टेट प्रेम की इन चारों ओर चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि मंत्री जी अपने क्षेत्र में बतौर बिल्डर का काम शुरु कर दिया है। हालांकि फ्रंट लाइन में मंत्री जी का नाम कहीं नहीं है। लेकिन जमीन से जुड़े होने का इतना फायदा तो बनता है। हालांकि जमीन और मकान के कारोबार में मुनाफा भी चोखा है। इसलिए जमीन से जुड़कर रहने में ही भलाई है। लेकिन ऐसी बातें भला छिपती कहां हैं। बहरहाल मसले में कितना सच-कितना झूठ फिलहाल इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन मंत्री जी इन दिनों चहूंओर चर्चा के विषय बने हुए हैं।

ऋचा शर्मा का दिल्ली जाना कैंसल

एसीएस ऋचा शर्मा का जनवरी माह में लगभग दिल्ली जाना तय माना जा रहा था। ऋचा के दिल्ली जाने से खुश कुछ अफसरों ने तो इयर एंड में छुट्टियों के लिए आवेदन भी कर दिया था। लेकिन अचानक खबर छनकर सामने आ रही है कि फिलहाल ऋचा शर्मा ने दिल्ली जाने का इरादा कैंसल कर दिया है। अब ऋचा शर्मा के दिल्ली न जाने की खबर सुनकर वन मुख्यालय के कुछ अफसर खासे मायूस हैं। कुछ अफसर तो यह मानकर चल रहे थे कि ऋचा शर्मा के दिल्ली जाने से रिटायरमेंट के छह माह आसानी से कट जाएंगे। लेकिन अचानक ऋचा के दिल्ली न जाने की खबर सुनकर उनके चेहरे पर मायूशी दिखने लगी है। तो वहीं कुछ अफसरों को ऋचा शर्मा का दिल्ली न जाना संजीवनी का भी काम करेगा। हालांकि ऋचा शर्मा को दिल्ली न भेजा जाए इसको लेकर रायपुर के एक वन्य जीव प्रेमी ने राज्य सरकार से लेकर पीएमओ तक पत्र लिखा है। यह पहली दफा है कि जब किसी एसीएस के दिल्ली जाने का विरोध किया जा रहा है। इसके पहले कलेक्टर-एसपी को हटाये जाने का विरोध स्थानीय लोग करते रहे हैं। लेकिन यह पहली बार हो रहा है कि किसी एसीएस के काम से प्रभावित होकर वन्य जीव प्रेमी उन्हें राज्य में ही काम करने के लिए पीएमओ तक पत्र लिख रहे हैं।

रितेश, जितेन्द्र, संजीव और एल्मा का कद बढ़ा

राज्य सरकार ने इसी सप्ताह 13 आईएएस अफसरों के प्रभार बदले हैं। जिसमें कई अफसरों के कद को बढ़ाया गया है, वहीं कुछ अफसरों से विभाग वापस लिए गए हैं। दरअसल सरकार अफसरों के कामकाज पर लगातार निगरानी बनाए हुए है। साथ ही नए सीएस विकासशील के आने के बाद यह बदलाव कई मायनों पर अहम माना जा रहा है। इस आदेश में सीजीएमएससी के एमडी रितेश अग्रवाल का कद बढ़ाया गया है, उन्हें वर्तमान दायित्वों के साथ आयुक्त चिकित्सा शिक्षा का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। वहीं आईएएस किरण कौशल को मंत्रालय लाया गया है, इसके साथ ही आईएएस जितेन्द्र शुक्ला के कद को बढ़ाते हुए उन्हें मार्कफेड का एमडी बनाया गया है। साथ ही मिशन को प्रभार में दिया गया है। संजीव कुमार झा को स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पदुम एल्मा ने लंबी छलांग लगाई है एल्मा को बेवरेजेस कार्पोरेशन के साथ ही स्टेट मार्केटिंग कार्पोरेशन का दायित्व सौंपा गया है।

रमन सिंह ने भी संविदा की परंपरा बरकरार रखी

छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा को संविदा नियुक्ति दे दी गई है । विधानसभा अध्यक्ष के रूप में डॉ रमन सिंह ने भी अन्य की तरह संविदा प्रथा को प्राथमिकता दी है। फि़लहाल दिनेश शर्मा संविदा में सचिव के दायित्व का निर्वहन करते रहेंगे। हालाँकि यह परंपरा कोई नई नहीं है , पहले भी छत्तीसगढ़ विधानसभा का प्रशासकीय जि़म्मा कई दफ़े संविदा पर ही चलता रहा है । इसलिए दिनेश शर्मा को विधानसभा सचिव पद पर संविदा देने पर किसी को कोई एतराज़ नहीं है। लेकिन ऐसा  क्या कारण है कि सभी अध्यक्ष एक ही निर्णय लेते आ रहे हैं? इस पर मंथन किया जाना चाहिये। अब कारण जो भी हो लेकिन इस संविदा को लेकर विधानसभा के अधिकारियों और कर्मचारियों में दवे स्वर में विरोध शुरू हो गया है ।

 

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